कुछ भोले लोग समझते हैं कि अगर भगवान् इस समय अवतार लेकर आ जाएँ, तो हम उनको देखते ही मुग्ध हो जाएँ और माया से उत्तीर्ण हो जाएँ। कुछ करना-धरना न पड़े। क्योंकि इतिहास में हम पढ़ते हैं कि राम को जनक ने देखा और देखते ही मुग्ध हो गए। ऐसे ही बड़े-बड़े महापुरुष जब भगवान् को देखकर दीवाने हो गए, ऐसे हम भी दीवाने हो जाते।
लेकिन ऐसा नहीं है।
अवतारकाल में भगवान् या संत को देखकर जो दीवाने हो जाते हैं, उनका अंतःकरण शुद्ध होता है, वो अधिकारी होते हैं। जैसे चुम्बक शुद्ध लोहे को खींच लेती है, शुद्ध मन भगवान् या संत की ओर खिंच जाता है। जिस लोहे में जितनी पर्सेंट मिलावट होती है, उसको चुम्बक उसे उतनी पर्सेंट ही खींच पाती है। अंतःकरण-शुद्धि की यही पहचान है। हम लोगों में तो 99 % मिलावट है। तो अगर हम ऐसी आशा करें कि 'अगर अब भगवान् का अवतार होता, तो हम जल्दी खिंच जाते,' ऐसा नहीं है। जब भगवान् राम आए थे, उस समय हम लोग भी थे। लेकिन भगवान् और संत के प्रति हमारी जैसी भावना होगी, वे उसी प्रकार के दिखाई पड़ेंगे - जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। तो हमने राम को देखा, और चूंकि हमारा अंतःकरण गन्दा था, इसलिए हमने कहा, "ठीक है, लड़का अच्छा है, कॉमन मैन है।" दूसरी ओर जब महापुरुष ने उनको देखा, तो उन्होंने कहा - 'चिदानंदमय देह तुम्हारी' - चूंकि उनकी दृष्टि दिव्य है, वो अनंत आनंद का अनुभव करते हैं।
जैसे एक कुएँ में कोई एक लोटे को डुबाएगा, तो एक लोटा-भर पानी निकलेगा। एक घड़े को डुबाएगा, तो घड़ा-भर पानी निकलेगा। यानी बरतन जितना बड़ा है उतना ही पानी उस कुएँ से निकाल पाएँगे। इसमें कुआँ क्या कर सकता है? ऐसे ही हमारे अन्तःकरण का बरतन जिस प्रकार का है, भगवान् और संत उसी प्रकार के दिखाई पड़ेंगे। अगर हमारा अंतःकरण गन्दा होगा, तो हम श्रीकृष्ण को देखकर उनको लफंगा कहेंगे, क्योंकि हम भी लफंगे हैं - संसार के प्रति हमारी गन्दी भावनाएँ रहती हैं, और वही भावना हम भगवान् के पास भी ले जाते हैं।
अवतारकाल में संत और भगवान् के प्रति गन्दी भावना रखने वाला नामापराध कमाकर और नुकसान मोल लेता है। उदाहरण के लिए रामावतार में धोबी की सीता मैया के प्रति गन्दी भावना थी। तो अपनी भावना के अनुसार ही अवतारकाल में लोग भगवान् और संत को देखते हैं, और उसी के अनुसार फल मिलता है - एक भगवत्प्राप्ति कर लेता है, और एक नामापराध कमाकर लौट आता है। जब हम अपने ही माँ-बाप-बीवी को ही नहीं समझ सके, तो इस मायिक बुद्धि को लेकर भगवान् और संत को कैसे समझ पाएँगे?
इसलिए इस धोखे में न रहें कि अवतारकाल में अगर हम होते तो हमारा काम बन जाता। अनंत बार हमने राम और कृष्ण को देखा है, लेकिन लाभ नहीं ले सके। आज वे आएँगे, तो आज भी हम यही कहेंगे कि, "ठीक है, हमसे ज़रा अधिक काबिल हैं" - हम इसके आगे नहीं जाएँगे। साधना के द्वारा जब हम अधिकारी बनेंगे तभी भगवान् का पूरा लाभ मिलेगा चाहे अवतार काल हो या न हो।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें:
Tattvajnan ka Mahatva - Hindi
Prashnottari (Vol. 1-3) - Hindi
कुछ भोले लोग समझते हैं कि अगर भगवान् इस समय अवतार लेकर आ जाएँ, तो हम उनको देखते ही मुग्ध हो जाएँ और माया से उत्तीर्ण हो जाएँ। कुछ करना-धरना न पड़े। क्योंकि इतिहास में हम पढ़ते हैं कि राम को जनक ने देखा और देखते ही मुग्ध हो गए। ऐसे ही बड़े-बड़े महापुरुष जब भगवान् को देखकर दीवाने हो गए, ऐसे हम भी दीवाने हो जाते।
लेकिन ऐसा नहीं है।
अवतारकाल में भगवान् या संत को देखकर जो दीवाने हो जाते हैं, उनका अंतःकरण शुद्ध होता है, वो अधिकारी होते हैं। जैसे चुम्बक शुद्ध लोहे को खींच लेती है, शुद्ध मन भगवान् या संत की ओर खिंच जाता है। जिस लोहे में जितनी पर्सेंट मिलावट होती है, उसको चुम्बक उसे उतनी पर्सेंट ही खींच पाती है। अंतःकरण-शुद्धि की यही पहचान है। हम लोगों में तो 99 % मिलावट है। तो अगर हम ऐसी आशा करें कि 'अगर अब भगवान् का अवतार होता, तो हम जल्दी खिंच जाते,' ऐसा नहीं है। जब भगवान् राम आए थे, उस समय हम लोग भी थे। लेकिन भगवान् और संत के प्रति हमारी जैसी भावना होगी, वे उसी प्रकार के दिखाई पड़ेंगे - जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। तो हमने राम को देखा, और चूंकि हमारा अंतःकरण गन्दा था, इसलिए हमने कहा, "ठीक है, लड़का अच्छा है, कॉमन मैन है।" दूसरी ओर जब महापुरुष ने उनको देखा, तो उन्होंने कहा - 'चिदानंदमय देह तुम्हारी' - चूंकि उनकी दृष्टि दिव्य है, वो अनंत आनंद का अनुभव करते हैं।
जैसे एक कुएँ में कोई एक लोटे को डुबाएगा, तो एक लोटा-भर पानी निकलेगा। एक घड़े को डुबाएगा, तो घड़ा-भर पानी निकलेगा। यानी बरतन जितना बड़ा है उतना ही पानी उस कुएँ से निकाल पाएँगे। इसमें कुआँ क्या कर सकता है? ऐसे ही हमारे अन्तःकरण का बरतन जिस प्रकार का है, भगवान् और संत उसी प्रकार के दिखाई पड़ेंगे। अगर हमारा अंतःकरण गन्दा होगा, तो हम श्रीकृष्ण को देखकर उनको लफंगा कहेंगे, क्योंकि हम भी लफंगे हैं - संसार के प्रति हमारी गन्दी भावनाएँ रहती हैं, और वही भावना हम भगवान् के पास भी ले जाते हैं।
अवतारकाल में संत और भगवान् के प्रति गन्दी भावना रखने वाला नामापराध कमाकर और नुकसान मोल लेता है। उदाहरण के लिए रामावतार में धोबी की सीता मैया के प्रति गन्दी भावना थी। तो अपनी भावना के अनुसार ही अवतारकाल में लोग भगवान् और संत को देखते हैं, और उसी के अनुसार फल मिलता है - एक भगवत्प्राप्ति कर लेता है, और एक नामापराध कमाकर लौट आता है। जब हम अपने ही माँ-बाप-बीवी को ही नहीं समझ सके, तो इस मायिक बुद्धि को लेकर भगवान् और संत को कैसे समझ पाएँगे?
इसलिए इस धोखे में न रहें कि अवतारकाल में अगर हम होते तो हमारा काम बन जाता। अनंत बार हमने राम और कृष्ण को देखा है, लेकिन लाभ नहीं ले सके। आज वे आएँगे, तो आज भी हम यही कहेंगे कि, "ठीक है, हमसे ज़रा अधिक काबिल हैं" - हम इसके आगे नहीं जाएँगे। साधना के द्वारा जब हम अधिकारी बनेंगे तभी भगवान् का पूरा लाभ मिलेगा चाहे अवतार काल हो या न हो।
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