कैसे करें साधना में तीव्र प्रगति?
- खाली समय में, श्वास-श्वास से, बिना माला के, राधे नाम का जाप करो।
- निरर्थक बात न करो। संसार में काम-काम की बात करो। कम बोलो, मीठा बोलो। कम लोगों से दोस्ती रखो, कम लोगों से मिलो।
- संयम के साथ वाणी का प्रयोग करो। भक्त बनना है तो सबमें भगवान् को देखो; किसी का अपमान न करो। कड़क न बोलो। कोई ऐसा वाक्य न बोलो जिससे चपरासी को भी दुःख हो। किसी को भी दुखी न करो।
- अगर कोई तुम्हें डाँट दे या अपमानित कर दे, तो उसे सहन करने की शक्ति बढ़ाओ। अपने से बड़े की बात तो सहन करनी ही चाहिए, लेकिन जो अपने से छोटे की बात भी सहन कर ले, वह पक्का साधक है - उसकी साधना बहुत तेज़ी से बढ़ेगी। सहनशीलता, नम्रता और दीनता को बढ़ाओ। इससे साधना की पूँजी बची रहेगी। हानि से बचने का अभ्यास करना चाहिए, ताकि जो कमाया जाए, वह बचा रहे।
- अपना नुकसान न हो - जो कमाया है, उसे बचाओ। न प्लस करें तो कम से कम माइनस तो न हो।
- काम, क्रोध, लोभ, मोह, राग-द्वेष आदि दोष साधना की पूँजी को बिगाड़ देते हैं और साधक फिर से वहीं पहुँच जाता है, जहाँ से चल था। इनसे बचकर रहो। भगवान् की भक्ति करके जो कमाई कर रहे हो, इसमें गड़बड़ न होने पाए - ये सावधानी बरतनी चाहिए। घर में अगर कोई गलती करे तो स्वाभाविक है कि क्रोध आएगा। लेकिन इसकी शुरुआत में ही सावधान होकर इसको दबाना सीखो। इसी से भगवान् और गुरु की कृपा मिलेगी - वे हर समय हमारे साथ रहकर हमको देख रहे हैं।
- लोगों का यह सिद्धान्त, कि "जब कोई हमें कुछ बोलता है, तो अगर हम उल्टा जवाब नहीं देंगे तो वह और सिर पर चढ़ जाएगा" - यह पागलपन है। घर में अगर एक व्यक्ति बोले, तो दूसरा चुप हो जाए। कुछ देर बोलने के बाद जब उसका क्रोध शांत हो जाएगा, वह स्वयं फील करेगा कि "ऐसा करने से हमको क्या मिला?" इससे बात आगे नहीं बढ़ेगी। चाहे भाई, बहन, पड़ोसी, दोस्त या कोई भी रिश्ता हो - सबमें प्यार की भावना रखो और प्यार का व्यवहार करो।
- अपने में दोष देखो। अपने दोषों को कंट्रोल करना सीखो। और दूसरे में दोष न देखो। अगर मन से भी दूसरे के प्रति दुर्भावना की, तो वही व्यक्ति तुम्हारे अंदर आ जाएगा। तो जो मन साधना से शुद्ध हो रहा है, वह फिर से गंदा हो जाएगा। इससे अपना नुकसान हो जाएगा। एक ही मन है - उसी में भगवान् और गुरु को लाना है। इसलिए जितना समय मिले मन में हरि-गुरु को ही लाओ, तो मन की शुद्धि होती जाए।
- टाइम का सदुपयोग करो। जो भी समय मिले साधना में लगाओ। ये ज़रूरी नहीं कि भगवान् की मूर्ति के आगे बैठकर ही साधना करो। चलते-फिरते मन ही मन में भगवान् के नाम का जप करना भी साधना ही है।
- अगर गलती से कोई गड़बड़ी हो जाए, तो उसको फील करो और सुधार करो।
- बहुत संभलकर चलना है। मानव देह अमूल्य है। पता नहीं कल का दिन मिले न मिले। राग-द्वेष में इस देह को समाप्त न करो। लापरवाही न करो। लापरवाही से ही इस मन से बड़े-बड़े योगी लोग हार गए। लापरवाह रहने वाले को माया नचा डालेगी और बरबाद कर देगी - फिर कुत्ते, बिल्ली, गधे की योनियों में जाना पड़ जाएगा। फिर गुरु और भगवान् को क्या जवाब देंगे? - मनुष्य जन्म मिल गया, भारत में जन्म मिला, गुरु भी सही मिले, तत्त्वज्ञान भी हो गया, सब बात समझ में आ गई और फिर लापरवाही से हमने सब बिगाड़ दिया?
सवेरे उठकर दो मिनट सोचो - हमें सावधान रहना है। और रात को सोते समय सोचो कि आज हमने कहाँ गड़बड़ किया - कहाँ-कहाँ क्रोध किया, कहाँ-कहाँ लोभ किया, किसको दुःख दिया? जहाँ गड़बड़ी हुई, उसको फील करो और उसको सुधारो - यह पक्का निश्चय करो कि अगले दिन यह गलती दोबारा न होने पाए। फिर यह गड़बड़ी कम होते-होते खत्म हो जाएगी। हर समय गुरु और भगवान् को अपने हृदय में साथ रखो। वे तभी कृपा करेंगे, जब ये गंदगी तुम्हारे हृदय से निकलेगी। इस प्रकार अभ्यास करने से तुम दस-बीस दिन में ही अपने को बहुत आगे पाओगे। इसलिए सावधान होकर अभ्यास में जुट जाओ।
देख लो, केवल एक महीने का अभ्यास करने से तुम्हें कितनी शांति मिलती है और कितना सुख मिलता है।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें: