क्या गुरु भगवान् से बड़े हैं? श्री महाराज जी का उत्तर
वेदों, शास्त्रों और पुराणों में कहीं लिखा है कि भगवान् बड़े हैं, कहीं लिखा है कि संत बड़े हैं और कहीं लिखा है कि दोनों बराबर हैं। इसलिए साधक को कंफ्यूजन है।
श्री महाराज जी का उत्तर -
वेदान्त में वेदव्यास ने इस प्रश्न का यह उत्तर दिया है -
संत और भगवान् में केवल एक अंतर है -
जगद्व्यापारवर्जं।
संसार बनाना, उसकी रक्षा करना, उसका प्रलय करना - यह सब संसार संबंधी काम केवल भगवान् करते हैं। यह काम उन्होंने किसी महापुरुष को नहीं दिया। भगवान् में जो आनंद, ज्ञान और सत्ता - नित्यता - है वो सब भगवान् महापुरुष को दे देते हैं। महापुरुष का अपना कुछ नहीं है - उनके पास जो कुछ है, वह भगवान् का ही दिया हुआ है।
बाकी सब केवल कहने की बातें हैं -
संत तो भगवान् से बड़ा इसलिए कहा गया है क्योंकि प्रारंभ से अंत तक हमारा सब काम संत के द्वारा ही चलता है। प्रारंभ में भगवान् तो आकर हमको मार्ग बताएँगे नहीं, न ही चलाएँगे। अंत में भी दिव्य प्रेम दान आदि संत ही करते हैं इसलिए हम उनका एहसान मानते हैं -
मोरे मन प्रभु अस विश्वासा राम ते अधिक राम कर दासा।
भगवान् ने भी इस पर साइन कर दिया -
मद्भक्त पूजाभ्यधिका।
मेरे भक्त की पहले पूजा करना, बाद में मेरी करना।
वेदों में भगवान् की परिभाषा का बड़ा सुंदर निरूपण है -
भृगुर्वै वारुणिः वरुणं पितरमुपससार अधीहि भगवो ब्रह्मेति
भृगु मुनि के पिता वरुण ब्रह्मज्ञानी थे। भृगु ने अपने पिता से पूछा, "आप तो भगवान् को जान चुके हैं, पा चुके हैं। मुझे भगवान् की परिभाषा बताइए।"
वरुण ने उत्तर दिया -
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते येन जातानि जीवन्ति यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति
i) जिससे संसार की रचना होती है,
ii) जिसके द्वारा संसार की सुरक्षा होती है, और
iii) जिसमें संसार का लय होता है -
उसको भगवान् कहते हैं। यह परिभाषा भगवान् के अलावा और किसी के प्रति लागू नहीं हो सकती।
भृगु को फिर भी समझ में नहीं आया। तो वरुण ने कहा "ऐसे लेक्चर सुनने से नहीं समझोगे। साधना करो।"
तो भृगु ने जाकर तप किया, साधना की। फिर आकर उनसे बोले "मैं समझ गया -
अन्नं ब्रह्मेति व्यजानात्।
"अन्न ही ब्रह्म है। क्योंकि माँ के पेट में ये अन्न गया और इसी अन्न से शरीर बना, फिर पैदा होने के बाद भी अन्न से जीवित रहा। फिर मरने पर इसी पंचमहाभूत में फिर समा जाएगा।"
वरुण ने मुस्कुराया और कहा, "नहीं, जाओ और साधना करो।"
भृगु साधना करने लौट आए। उन्होंने कहा -
प्राणो ब्रह्मेति व्यजानात्।
"हमारे अंदर पाँच प्राण है, तो प्राण ब्रह्म है।" वरुण ने कहा, "नहीं, अभी नहीं समझे। तो भृगु फिर से साधना करके लौटे और कहा -
मनो ब्रह्मेति व्यजानात्।
"मन ही ब्रह्म है"। वरुण ने कहा, "नहीं समझे"
फिर भृगु ने कहा -
विज्ञानं ब्रह्मेति व्यजानात्।
"जीवात्मा ब्रह्म है।" वरुण ने कहा, "नहीं समझे, फिर जाओ।"
फिर आखिर में भृगु साधना कर आए और उन्होंने कहा -
आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात्। (तैत्तिरीयोपनिषद)
"आनंद ब्रह्म है।"
वरुण ने कहा, "हाँ बेटा, अब समझे। ब्रह्म की यही परिभाषा है - आनंद ब्रह्म है।"
आनंद क्या है?
ये बताया नहीं जा सकता। जिसको सब चाहते हैं, लेकिन कोई नहीं जानता।
सब क्यों चाहते हैं?
इसलिए कि हम आनंद के अंश हैं -
यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते।
आनंद से सब पैदा हुए हैं। जिससे जो पैदा होता है, वो उसका अंश कहलाता है। अंश हमेशा अपने अंशी को ही चाहेगा - चाहना पड़ेगा क्योंकि ये नेचर है।
तो संसार को जिसने बनाया, उसका नाम भगवान् है।
फिर आगे वेद कहता है -
सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति स तपोऽतप्यत स तपस्तप्त्वा इदं सर्वमसृजत यदिदं किंच तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् (तैत्तिरीयोपनिषद)
भगवान् ने सोचा - उन्होंने कामना की।
वैसे तो भगवान् कामना रहित हैं - वे तो पूर्ण काम हैं। लेकिन उन्होंने संसार बनाने की कामना की। क्यों?
तस्मादेकाकी न रमते।
भगवान् अकेले थे। और कुछ नहीं था - हम लोग भी नहीं थे और ये जड़ सामान भी नहीं था। तो -
नैव रेमे
उनका मन नहीं लगा।
मन कहाँ था?
पहले मन भी नहीं था। जब तक मन नहीं था तब तक भगवान् आनंद में अकेले पड़े रहे। तो उन्होंने पहले मन बनाया। और जब मन बनाया तो उनको अकेलापन लगा - अकेले उनका मन नहीं लगा। तो उन्होंने संसार बनाया। फिर - तदेवानुप्राविशत् - साथ-साथ स्वयं संसार में घुस गए। फिर सर्वव्यापक भी हो गए - उन्होंने सब जीवों को शरीर दिया और उन शरीरों में एक-एक रूप में बैठ गए। फिर उनके अनंत जन्मों के कर्मों की बही-खाता बनाए।
अनेक उपनिषदों में यही बात कही गई है।
भगवान् के आठ गुण होते हैं। उनमें एक गुण है सत्यसंकल्प। अर्थात् जो सोचा हो गया।
तो अगर उन्होंने सोचा, इच्छा की, कामना की और संसार बन गया तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं है।
लेकिन उन्होंने ये गंदा संसार क्यों बनाया? वे तो आनंद स्वरूप हैं और यहाँ तो दुख ही दुख है। वे सर्वज्ञ हैं और यहाँ सब अज्ञानी हैं। वे नित्य हैं और संसार अनित्य है। एक दिन संसार का प्रलय होगा, यहाँ सब चीज नश्वर है। संसार का नियम भी यही है कि जैसे गाय से गाय, भैंस से भैंस और आदमी से आदमी पैदा होता है, वैसे ही भगवान् से भी भगवान् के समान निकलना चाहिए - लेकिन संसार का तो सब उल्टा है।
इसके लिए वेद कहता है -
नहीं, भगवान् ने नया कुछ नहीं बनाया -
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत् (नारायणोपनिषद)
जैसे पहले था वैसे ही प्रकट कर दिया। हम भी अनादि हैं, माया भी अनादि है भगवान् भी अनादि हैं। भगवान् के महोदर में महाप्रलय में हम सब लोग थे। तो जैसे महाप्रलय में हम अनंत पाप अनंत पुण्य सब के साथ भगवान् के महोदर में घुसे, सृष्टि के समय वैसे के वैसे प्रकट हो गए। इसीलिए कोई मनुष्य बना, कोई गधा बना, तो कोई वृक्ष बना। भगवान् ने कुछ नया नहीं बनाया। जैसे पहले था, वैसे ही प्रकट कर दिया। इसलिए भगवान् के ऊपर कोई आक्षेप नहीं लग सकता।
वैषम्यनैर्घृण्ये (वेदांत)
इसलिए भगवान् और महापुरुष में बस सृष्टि का ही अंतर है।
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