मन की मत सुनो!

मन की मत सुनो!

मन ही सबसे बड़ा शत्रु है -
अनादिकाल से हमने अपने सबसे बड़े शत्रु मन को सबसे बड़ा मित्र बना रखा है। मन ने कहा, "ऐसा करो", तो हम हँसकर बोलते हैं "ठीक है।" ये मन माया का पुत्र है और माया के जगत में नेचुरल ले जाना चाहता है, पूरी ताकत से। वो बड़ा बलवान भी है। इसने बड़े-बड़े तपस्वियों के छक्के छुड़ा दिए, जिन्होंने इसको दुश्मन माना हुआ था। तो जो इसको दुश्मन न माने, उसका क्या हाल होगा? वो तो बेचारे मन के इशारे पर नाच रहे हैं। मन कहता है, "आँखों - संसार को देखो!", "कान - संसार की बात सुनो!" - यानी मन सब इन्द्रियों को अपने अंडर में करके जीवात्मा को चौरासी लाख योनियों में घुमा रहा है। और जीव बेचारा असहाय होकर घूम रहा है।

इतने बड़े परमहंस रामकृष्ण परमहंस की भी पैसे में आसक्ति थी। तो उन्होंने एक हाथ में मिट्टी ली और एक हाथ में पैसा - और बार बार "टाका-माटी, टाका-माटी" (बंगाली में पैसे को टका कहते हैं) कह-कहकर बुद्धि में भर ली कि पैसा मिट्टी है और मन को पैसों से हटाया। इसी तरह स्वामी रामतीर्थ की सेब में बड़ी आसक्ति थी। तो उन्होंने सेब को सामने रख दिया। और रोज़ दाल-रोटी आदि सब कुछ खा लिया, पर सेब नहीं खाया। उन्होंने उससे कहा, "तुझको मैं खाऊँगा नहीं कभी। इस मन की नहीं सुनूँगा। मेरी भी ज़िद है।" ऐसे करने से मन हार जाता है।

बन्दर इतना चंचल होता है। उसको जब मदारी अपने कंट्रोल में करता है, तो उसकी तरकीब ये है, कि उसे वो पहले पचास फुट की रस्सी में बाँध देता है। जब बंदर पचास फुट के आगे चलने लगता है, रस्सी उसके गले को कसने लगती है। फिर जाना चाहता है तब फिर उसको रस्सी कसने लगती है। जब दर्द होने लगता है तो बंदर पचास फुट के अंदर ही कूदने लगता है। कूदने की उसकी आदत है, तो उसे वो कैसे छोड़े? तब मदारी उस बंदर को पच्चीस फुट की रस्सी में बाँध देता है। ऐसे करते-करते जब वह उसे एक फुट की रस्सी में बाँध देता है, तो बन्दर चुपचाप बैठ जाता है। फिर मदारी के इशारे पर वो सब काम करता है।

ऋषभ भगवान् के सामने सिद्धियाँ प्रकट हुईं। ऋषभ भगवान् ने उनसे पूछा, "तुम लोग किसलिए आए हो?" तो सिद्धियों ने कहा, "आपकी सेवा के लिए।" उन्होंने कहा, "किसने बुलाया तुमको यहाँ। भागो यहाँ से। हम ऐसी सेविका नहीं रखते, जो हमारे दुश्मन से मिल जाए। हमारा सबसे बड़ा दुश्मन मन है और तुम उसको मिला लोगी। और वो सिद्धियों के चक्कर में पड़ जाएगा और चमत्कार दिखाकर नाम कमाना चाहेगा। इससे हम भगवान् से अलग हो जाएँगे।
हम भगवान् के अवतार हैं। अगर हम विपरीत काम करेंगे, तो सब विपरीत काम करेंगे।" फिर उन्होंने कहा -
न कुर्यात्कर्हिचित्सख्यं मनसि ह्यनवस्थिते।
यानी मन से कभी दोस्ती नहीं करना।
क्यों? -
योगिनः कृत मैत्रस्य पत्युर्जायेव पुंश्चली -
जैसे कोई दुराचारिणी स्त्री अपने लवर से मिलकर अपने पति का मर्डर करा देती है, ऐसे ही ये मन भी दुश्मन है। ये अपनी मम्मी माया से मिलकर भगवान् के पुत्र जीव का पतन करा देती है। और बड़े आराम से उसी के पीछे-पीछे चलता जाता है। वो सोचता है, "मेरा मन कर रहा है।" अगर बुद्धि कहे, "पर गुरु जी ने तो ये कहा है!" तो वो कहता है "कहा होगा, पर मेरा मन तो ये कर रहा है।" जब तक कोई व्यक्ति -

  1. गुरु की आज्ञा और
  2. वेद की आज्ञा
    इन दो आज्ञाओं से अपने मन को नहीं चलाएगा, तब तक अनंत जन्म बीत चुके, और आगे भी बीतेंगे - वो मन का दास कभी भगवत्प्राप्ति नहीं कर सकता।

तो मन से कभी दोस्ती नहीं करना, वरना अनंत जन्म बीत जाने पर भी भगवत्प्राप्ति नहीं हो सकती। संसार में और किसी की दुश्मनी तो माफ़ी माँगने पर खतम हो जाती है। लेकिन अगर मन सौ बार माफ़ी माँगे तो भी नहीं सुनना, क्योंकि ये 101वी बार हमको उड़ा ले जायेगा।
इसलिए हर समय सावधान रहो - गुरु और शास्त्र के आदेश को ही मानना है, उसी से मन को चलाना है। मन की नहीं सुनना। ये टेम्पोरेरी इन्द्रियों का सुख चाहता है, उसे इसी का अभ्यास है। अतएव अपने शत्रु को सदा समझे रहो।

इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें:

Bhaktiyoga ki Saral Sadhana

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