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मौन और नियम-पालन का महत्त्व -
साधना में कुछ नियम बनाए गए हैं, जिनका आपको पालन करना होगा। इन नियमों का पालन आपको डर के मारे नहीं, बल्कि अपने लाभ के लिए करना चाहिए। डर के मारे मानने वाला साधना नहीं कर सकता। जो (नियमों के महत्त्व को) समझकर उनको माने और इशारे में ही उसका दुगुना माने - वही वास्तविक साधक है।

  1. मौन का महत्त्व -
    बहिरंग नियमों में एक नियम यह है कि "मौन रहो।"

मौन का मतलब क्या है? मौन का मतलब यह नहीं है कि "न बोलना।" मौन का आशय यह है कि संसारी बात न करो, न सुनो।

यह नियम क्यों बनाया गया?

संसार में जितने झगड़े और अशांति चल रहे हैं, उनका 99% कारण ज़बान है। बाप ने बेटे को डाँटा या पति ने बीवी को डाँटा कि "तुमने ऐसा क्यों किया?" तो वह तुरंत जवाब देते हैं कि "और क्या करते?" बस, लड़ाई शुरू हो गई। बात यहाँ तक बढ़ सकती है कि मारपीट भी हो सकती है, तलाक भी हो सकता है, सब कुछ हो जाता है।

वाणी इतनी खतरनाक है कि आपके मन में चाहे जैसे भी भाव हो, अगर वाणी ठीक है, तो वहाँ अशांति नहीं होगी, या बहुत कम होगी। आपकी वाणी से बात बाहर नहीं फैलेगी - आप तक ही सीमित रहेगी।

इसलिए मौन का मतलब यह है -
मौनमात्मविनिग्रहः
गीता में कहा गया है कि मौन का मतलब है इंद्रियों का निग्रह।

हमारी पाँच ज्ञानेंद्रियाँ मन के साथ जुड़ी हुई हैं। हमारी बस पाँच कामनाएँ हैं - देखना, सुनना, सूँघना, रस लेना, और स्पर्श करना। ये पाँच कामनाएँ हमारे भीतर अनादि काल से हैं, लेकिन जिस तरह का एटमॉस्फियर मिलता है, उसी के अनुसार बढ़ जाती हैं। जैसे आग जलाती तो है लेकिन अगर उसको घास, कागज़ या कोई सूखी वस्तु मिल जाए तो वो एकदम विराट रूप धारण कर लेती है, ऐसे ही हमारे भीतर जो पाँच प्रकार की कामनाएँ हैं, ये बाहर का वातावरण पाकर उद्दीप्त हो जाती हैं।

साधना में आपको कहीं बाहर का वातावरण नहीं मिलता, जैसे आप पिक्चर देखें, कुछ अंड-बंड खा सकें, कोई अंड-बंड विषय ग्रहण कर सकें - उसका चांस नहीं है। लेकिन ये ज़बान ऐसी है कि अगर कोई आदमी किसी आदमी को संसारी बात सुनाने लगे, तो ज्यों-ज्यों वो शब्द कान में पड़ते हैं, वैसे-वैसे आपका नैचुरल चिंतन बनता है।

तो मौन का आशय यह है कि समस्त इंद्रियों की वासनाओं पर कंट्रोल करने का अभ्यास करो। जब तक मनगढ़ में रहो, साधना करो। फिर उसी का अभ्यास अपने यहाँ भी करो। जो क्लास में टीचर पढ़ाता है, उसका घर में मनन और अभ्यास करने पर ही तो बच्चे परीक्षा दे पाएँगे।

लेकिन घर की बात तो आगे की बात रही। कम से कम यहाँ पर तो ठीक-ठीक नियम का पालन हो। इसलिए ये मौन का नियम बनाया गया है। सारे विश्व में केवल हमारे यहाँ की साधना में ये नियम हैं। विश्व में और किसी भी आश्रम में नहीं है। आश्रम में रहकर बातें कर रहे हैं, गप्पें हो रही हैं, और अपना टी.वी.-वी.सी.आर. भी चल रहा है, मटरगश्ती भी हो रही है - ये सब होता रहता है। एक-दो घंटे कीर्तन भी हुआ तो एक्टिंग के साथ। इसीलिए आपको कोई भी लाभ सामने नहीं आता। इसलिए मैंने प्रारंभ से ये नियम बना दिया है कि मौन रहो।

न बोलो, न किसी की सुनो। अगर यह कहो कि "साहब, सारे जीवन का इतना बोलने का अभ्यास है। ये बड़ा मुश्किल है।" अरे तो हमने कब कहा कि ज़बान में ताला लगा लो। कीर्तन करो ना, भगवद्विषय - नाम गुण लीला - खूब चिल्लाओ।

इसलिए यहाँ मौन रहने का नियम जो बनाया गया है उसके दो आशय हैं -
i) गलत चीज मस्तिष्क में न आए।
ii) यहाँ जो कुछ दिया जा रहा है - भगवन्नाम, गुण, लीला आदि - वो सब मस्तिष्क में आए।

जिस एरिया में जाओ, उसी के नियम का पालन करो। यहाँ पर यह करना है कि संसार के पाँचों विषय न मिलें - केवल ईश्वरीय विषय मिलें। यानी, अगर केवल आमदनी हो और खर्चा न हो, तो आदमी बहुत जल्दी लखपति बन सकता है। आजकल एक मामूली सर्वेंट भी दो-तीन हजार तनख्वाह पाता है। अगर उसे केवल जोड़ता जाए, तो चार साल में ही एक लाख हो जाएगा। लेकिन खर्चा इतना होता है कि बेचारा कर्ज़दार हो जाता है।

यानी आमदनी आमदनी हो - केवल प्लस-प्लस हो, माइनस न हो, तब आप देखें कि हम वहाँ दस दिन रहे लेकिन ऐसा लग रहा था कि हम गोलोक में हैं; कोई संसार का चिंतन टेंशन अशांति नहीं थी।

जो लोग यहाँ हमेशा आते हैं, वो जब अपने शहर में वापस जाते हैं तो ऐसा अनुभव करते हैं कि फिर वही संसार खोपड़ी में भर रहा है। उनको ऐसा अजीब सा लगता है कि हम कहाँ थे, कहाँ आ गए। एटमॉस्फियर का असर तो होगा ही। अगर कोई उसमें बहुत सावधान रहे, तो वह काफी बचत कर सकता है। लेकिन आम लोग सावधान नहीं रहते - इसलिए फिर संसार में बह जाते हैं। इस तरह दस-बीस दिन में जो कमाया, उसे पूरे साल में खर्च कर देते हैं और अपनी हानि करते हैं। फिर बैलेंस क्या होगा?

इसलिए मौन का नियम सबसे प्रमुख बहिरंग नियम है, लेकिन उसका वास्तविक तात्पर्य अंतरंग है। मौन रहने से अंतःकरण पर बाहर का असर नहीं पड़ेगा। अंतःकरण नॉर्मल रहेगा।

  1. समय की पाबंदी और नियम-पालन का महत्त्व
    दूसरा बहिरंग नियम यह है कि हर काम टाइम से हो। मनुष्य की पंक्चुअलिटी जो है - ठीक टाइम पर सब काम करना।
    किं पांडित्यं परिच्छेदः
    हमारे शास्त्र कहते हैं कि बुद्धिमत्ता यही है कि हम अपने मन को नियम की जंजीर में बाँध दें - इतने बजे ही सोना होगा, इतने बजे ही उठना होगा। टाइम पर क्लास में आना है, टाइम पर नाश्ते के लिए जाना है। अगर इस प्रकार दस दिन-बीस दिन, महीना-दो महीना-चार महीना ज़िद कर लो तो फिर आपके मन को वही अच्छा लगने लगेगा।

अपने को दीन मानो और यह सोचो कि "यहाँ जितने हैं, सब हमसे अच्छे हैं। हम ही अधम और अपराधी हैं।" जब किसी को आँसू बहाते हुए देखो, तो अपने आप को धिक्कारो कि "आखिर तेरे पास क्या है जो तू भगवान के आगे भी आँसू नहीं बहा सकता। एक ओर वो आँसू बहा रहा है। और तू अपने को बुद्धिमान कहता है। भगवान के आगे भी तू नहीं नम्र हो सकता है, मनुष्य की कौन कहे।" ऐसे साधना में अपने आप को धिक्कारो और फील करो। तब आगे बढ़ोगे।

दूसरों की ओर देख रहे हो कि वो आँसू बहा रहा है, वो बड़े भाव में है। तुम यहाँ पर निरीक्षक बनकर आए हो क्या? अरे, तुम साधक हो, तुमको साधना करना है कि दूसरे को देखना है? अगर दूसरा दिखाई भी पड़ जाए, तो फील करो कि हम भी तो इसी के लिए आए हैं। हमारे अंदर क्या बात है - न हमारी सुंदरता कामदेव के समान है, न हमारा ऐश्वर्य इंद्र के समान है, न हमारा गणेश के समान सम्मान है - हमारे पास कुछ भी सामान नहीं है। फिर किस बात का अहंकार है? ये मनुष्य का शरीर तो मल-मूत्र का पिटारा है - इसका अहंकार, या क-ख-ग-घ, ए-बी-सी-डी पढ़ के जो डिग्रियाँ ले ली हैं, उसका अहंकार, या करोड़-अरब कुछ रुपए इकट्ठा कर लिए हैं, उसका अहंकार? अरे ये क्या है? ये तो समुद्र की एक बूँद भी नहीं है। इसलिए हमेशा दीन भाव का अभ्यास रखना। किसी के प्रति दुर्भावना न हो। अपने दोषों को देखो, रीड करो और फील करो।

गुरु की आज्ञा के पालन का महत्त्व
तत्त्वज्ञान होते हुए भी हम लापरवाही करते हैं। गुरुजी और भगवान को मानते तो हैं, लेकिन मन में जो आता है, वही करते हैं। सोचते हैं कि गुरुजी क्या करेंगे? डाँट लेंगे या निकाल देंगे - तो निकल जाएँगे। लेकिन क्या आप यह नहीं सोचते कि ऐसे नामापराध का मरने के बाद अंतिम अंजाम क्या होगा? अगर ये सोचे होते तो भयभीत होकर संयमित होकर नियम के अंडर में रहते, कि गुरु और भगवान के विपरीत सोचना भी नामापराध है। उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना नामापराध है।

इसलिए अपने कल्याण के लिए इन नियमों का पालन कीजिए और जितने दिन भी हो सकें, अपना लाभ लीजिए।

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