साधना के नियम
साधना के नियम -
सम्पूर्ण विश्व में सर्वत्र नियम हैं। भगवान् के क्षेत्र में भी नियम हैं और माया के क्षेत्र में भी नियम हैं। बिना नियम के कहीं कोई स्थान नहीं है। परमाणु-परमाणु में नियम काम करता है। संसार में जितने वर्क आप लोग करते हैं सब में नियम होते हैं और नियम का पालन न करने पर वह वर्क लाभप्रद नहीं होता कभी-कभी हानिप्रद भी हो जाता है। अतएव इस साधना में भी नियम हैं।
जैसे आपका स्वरूप भी दो प्रकार का है - एक आपका स्थूल शरीर और एक भीतर वाला सूक्ष्म अंतःकरण। उसी के अनुसार नियम भी दो प्रकार के हैं: एक बहिरंग और एक अंतरंग।
बहिरंग नियम में सबसे प्रथम अनिवार्य नियम यह है कि आप लोग कोई भी वार्तालाप न करें। यह इसलिए है कि साधना के साथ-साथ वार्तालाप करके साधक अनजाने में घोर कुसंग कर बैठता है। यहाँ जितने लोग बैठे हैं, सब दोषी हैं, और जो नहीं आए हैं, वे भी। आप लोग भूल जाते हैं और आपको ओवर कॉन्फिडेंस रहता है कि मेरे ऊपर कुसंग का असर नहीं होगा। लेकिन होगा - भगवत्प्राप्ति के एक सेकंड पहले तक कुसंग का प्रभाव हो सकता है।
अजामिल पापियों में एक एक्ज़ाम्पल बन गया। भागवत के अनुसार इसका पूर्व जीवन इतना उत्कृष्ट था कि कोई कल्पना नहीं कर सकता था कि अजामिल का इतना पतन हो जाएगा। भागवत में उसके लिए लिखा है - वह दान्तः जितेन्द्रिय था, सदाचारी था, शास्त्र-वेद का विद्वान था, तत्त्वज्ञ था, नम्र था - जितने दैवी गुण होते हैं, उसमें सब थे। लेकिन एक क्षण के कुसंग ने उसको पापियों का एक्ज़ाम्पल बना दिया। इतना पतन हुआ। फिर आप लोग किस खेत की मूली हैं? किस दावे से सोचते हैं कि हमारे ऊपर कुसंग का असर नहीं होगा? आप लोग भूल जाते हैं। कोई संसार की बातें करने लगा, किसी की निंदा करने लगा तो आप लोग सुनने लगते हैं। सुनना सिद्ध करता है कि आपका अंतःकरण अत्यंत दूषित है, गंदा है। यह सिद्ध है कि आप भगवत्प्राप्ति नहीं चाहते।
आप जब खाना खाते हैं, अगर दांत के नीचे चावल में एक कंकड़ आ गया तो आप तुरंत चबाना बंद करके उस कंकड़ को निकालकर बाहर फेंक देते हैं। लेकिन जब आप आत्मकल्याण के लिए किसी के अनुगत होकर साधना करते हैं, यह भूल जाते हैं कि हम सारे कंकड़ खाए जा रहे हैं - ये पेट में जाकर क्या करेंगे? आप दूसरों की निंदा सुनते हैं, फिर उसके वाक्य को ऐसा मानते हैं जैसा गुरु के वाक्य को भी नहीं मानते। आप उसकी बातों का विश्वास कर लेते हैं जबकि आप जानते हैं वह भी अल्पज्ञ है और आप भी अल्पज्ञ हैं। जब तक कोई अन्तर्यामी न हो, तब तक किसी के विषय में कोई कुछ भी कहेगा तो सही नहीं कह सकता। केवल भगवान् और महापुरुष ही किसी की स्थिति को ठीक-ठीक समझ सकते हैं। अगर इसके पहले कोई दावा करता है कि मैं भी समझ सकता हूँ तो उसके समान पागल कोई नहीं है और उसका पतन निश्चित होगा आज नहीं तो कल।
गौरांग महाप्रभु ने कहा -
हेन कृष्ण नाम लये बहु बार तबे प्रेम नहीं, नहे अश्रुधार, तबे जानि अपराध आछये प्रचुर।
अगर कोई अनेक बार भगवान् का नाम ले चुका है, लेता है और फिर भी उसके अश्रुधार नहीं निकलती और भगवान् से प्रेम नहीं जागता, इसका केवल एक कारण है - नामापराध।
नाम्नामकारि बहुधा निज सर्व शक्तिस्तत्रार्पिता नियमितः स्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥ (शिक्षाष्टक)
भगवान् ने अपने नाम में सारी शक्तियाँ रख दी हैं, लेकिन उनको लेने पर भी और सुनने पर भी हमारे अंतःकरण में प्रेम का बीज नहीं अंकुरित होता, उसका एक ही कारण है - नामापराध।
इसलिए अंतःकरण संबंधी नियम भी आवश्यक हैं और बाह्य नियम भी आवश्यक हैं।
अगर हम बोलना बंद कर दें, तो सुनना भी बंद हो जाए। क्योंकि इतने ही साधक लोग तो हैं - जब कोई बोलेगा नहीं, तो दूसरा सुनेगा क्या? सुनना और बोलना - यही दो डेंजर हैं। इसलिए आज तो यह पहला नियम है कि यहाँ आप लोग - चाहे मिया-बीवी भी साथ आए हों - आपस में बातचीत नहीं करेंगे। यह दृढ़ प्रतिज्ञा करें।
अरे दस-पंद्रह दिन बोलना बंद करने में क्या खास बात है? बात करने में तो बुद्धि लगानी पड़ती है - पहले सोचना पड़ेगा फिर वाक्य बनाना पड़ेगा - तो इंद्रिय-मन-बुद्धि सब लग जाते हैं, उसमें परिश्रम है। बात न करने में क्या बुद्धि लगाना है? उसमें तो कोई परिश्रम नहीं है, चाहे वह बृहस्पति हो या अँगूठा छाप। दोनों बैठे हैं एक सीट पर चुप।
इसलिए आप लोगों से प्रार्थना है या आज्ञा है - जो भी आपको स्वीकार हो - कि जब तक आप यहाँ साधना में रहें, बातचीत न करें। और जो काम जिस समय यहाँ बताया जाए, उस समय आप लोग ठीक समय पर उपस्थित हो जाएँ। जिस समय यहाँ के जो नियम हों, उनका आप ठीक-ठीक पालन कीजिए।
इस प्रकार आपको जो समय-समय पर यहाँ के नियम बताए जाएँगे, उनका पालन करना होगा।
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