Daily Devotion -Apr 2, 2025 (Hindi)
मान और अपमान पर विचार करके कण्ट्रोल कर लें, तो हमारी साधना की गति तेज़ी से बढ़ेगी। ये दो दुश्मन हैं जिनकी वजह से हम अपराध करते हैं।
मान - हमें किसी के प्रसंशा करने पर, बाहर से मना करते हुए भी अंदर से खुशी की फीलिंग होती है। इसका कारण अहंकार है - हमने सारा जीवन यही कोशिश किया कि कोई हमारी बुराई न करे। अच्छा कहलवाने का प्रयास किया, अच्छा बनने का प्रयास नहीं किया।
अपमान - मान की इच्छा से अपमान की फीलिंग होती है। किसी के अपमान करते वक्त हमारे अंदर आग लग जाती हैं, क्रोध होता है। क्रोध से बुद्धि समाप्त हो जाती है।
इस के कारण: 1. हम मायाधीन हैं (अज्ञानी हैं - अपने को देह मानते हैं ) 2. हमें दिव्यानंद की भूख है। इसको पाने के लिये हम 'सब कुछ' कर सकते हैं।
मान अपमान तो संसार में होता रहेगा। एकांत में सोचो - ऐसा कौन सा दोष है, जो हमारे अंदर नहीं है (काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि)? इससे दीनता आयेगी, फीलिंग कम होगी। मान अपमान को हराना होगा।
घास के ऊपर जब पैर रखते हैं तो वह झुक जाता है। पेड़ के ऊपर पत्थर फेंकते हैं तो वह फल देता है। तृण से बढ़कर दीन बनो और पेड़ से बढ़कर सहनशील बनो।
अभी तक हम मन को दोस्त मान रहे थे। अब गुरु ने समझा दिया कि वही तो हमारा असली दुश्मन है - अब उसका कहा हुआ नहीं मानेंगे। मन के खिलाफ करने में परिश्रम पड़ेगा, लेकिन अभ्यास से हो जायेगा।
जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज की कुछ पुस्तकें जो साधना में आने वाली बाधाओं से आपकी रक्षा करेंगी :