व्यस्त जीवन में अध्यात्म के लिये कुछ समय

व्यस्त जीवन में अध्यात्म के लिये कुछ समय

आधुनिक युग की इस भागदौड़ और व्यस्त जीवनशैली में अध्यात्म के लिए समय निकालना कठिन होता जा रहा है। कभी-कभी अत्यधिक व्यस्तता के कारण पूरे दिन दैनिक चिन्तन के लिए समय ही नहीं मिल पाता। ऐसे में यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी दिनचर्या में आध्यात्मिक चिन्तन और स्वाध्याय के लिये कुछ समय अवश्य निर्धारित करें।

विश्व के पाँचवें मूल जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज कहते हैं— “तत्त्वज्ञान परमावश्यक है। तत्त्वज्ञान का विस्मरण हुआ कि मनुष्य पशु के समान हो जाता है।” गुरु ज्ञान और उनके उपदेश एक शस्त्र की भाँति होते हैं, जो कठिन से कठिन परिस्थितियों में हमारी सहायता करते हैं। इसलिये प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन दैनिक चिन्तन और स्वाध्याय के लिये समय निकालना चाहिये।

दैनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच यदि आध्यात्मिक ज्ञान को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लिया जाए, तो उसका निरन्तर चिन्तन और मनन सम्भव हो सकता है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘हरि गुरु स्मरण, दैनिक चिंतन’ पुस्तक को तैयार किया गया है। इसमें सप्ताह के अनुसार श्री गुरुवर के द्वारा की गई व्याख्याओं को संकलित किया गया है, जिससे कोई भी पाठक सोमवार से लेकर रविवार तक अपनी साप्ताहिक दिनचर्या के अनुसार दैनिक चिन्तन कर सकता है।

प्रति सप्ताह श्री गुरुदेव के दिव्य तत्त्वज्ञान को पढ़कर उसे अपने जीवन में आत्मसात करने का अवसर मिलता है। इस पुस्तक में व्याख्याओं को भी इस प्रकार रखा गया है कि व्यस्त से व्यस्त कार्य के मध्य भी साधक आसानी से समय निकाल सके।

शनिवार एवं रविवार सप्ताह के अंतिम दिन होते हैं। इन दिनों वर्क लोड अधिक नहीं होता और समय भी अपेक्षाकृत अधिक होता है, अतः इन दिनों के लिये आचार्य श्री की विस्तारपूर्वक की गई पद व्याख्या को रखा गया है। वहीं सोमवार से शुक्रवार तक वर्किंग लोड अधिक होता है, अतः इन दिनों के लिये संक्षिप्त पद व्याख्याओं को रखा गया है।

सभी साधकों, कर्मचारियों, ऑफिसर और हर वर्ग के लोगों को ध्यान में रखते हुए इस पुस्तक को बनाया गया है। इसका उद्देश्य यही है कि व्यस्त दिनचर्या के बीच भी व्यक्ति अपने आध्यात्मिक जीवन से जुड़ा रहे और गुरु के ज्ञान का नियमित रूप से पठन एवं मनन कर सके।

प्रतिदिन इसके पठन एवं मनन से साधना में दिन-प्रतिदिन वृद्धि होगी और बाहरी चकाचौंध का हमारे ऊपर अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इस प्रकार दैनिक चिन्तन केवल कुछ समय पढ़ने की प्रक्रिया न रहकर हमारे जीवन का एक स्वाभाविक और आवश्यक अंग बन सकता है।

हरि गुरु स्मरण- दैनिक चिंतन

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