Daily Devotion -Mar 18 , 2026 (Hindi)- आत्म-विस्मृति

Daily Devotion -Mar 18 , 2026 (Hindi)- आत्म-विस्मृति

आप लोगों ने एक शरीर धारण किया है, जिसका नाम मानव शरीर है। लेकिन आप मानव नहीं हैं। आपका शरीर मनुष्य का है। आप कहते हैं - मेरा शरीर, मेरी आँख, मेरा मन, मेरी बुद्धि - इसका अर्थ है कि "मैं" कोई अलग तत्व है, जिसे शास्त्रों में आत्मा कहा गया है। जब आत्मा चली जाती है, तब स्पष्ट हो जाता है कि शरीर अलग है और मैं अलग हूँ; बिना आत्मा के शरीर चौबीस घंटे भी नहीं चल सकता, वह सड़-गल जाता है। और जब तक आत्मा थी, तब तक उसका बड़ा मूल्य था - वह किसी का माँ या पिता होता है, या एक प्राइम मिनिस्टर होता है। आत्मा के जाते ही वही शरीर "मुर्दा" कहलाता है, जिसे लोग फ़ौरन घर से निकालने का इंतज़ाम करते हैं।

जैसे आत्मा अलग है और शरीर उसका सर्वेन्ट है, वैसे ही इंद्रियाँ, मन और बुद्धि सब मिलकर आत्मा की दासता करते हैं। आत्मा आनंद चाहती है, इसलिए इंद्रियाँ बाहर के विषयों को ग्रहण करती हैं, और बाहर के सामान जुटा-जुटाकर आत्मा को सुखी करने का प्रयत्न करती हैं। यह प्रयास अनंत युगों से चल रहा है, पर आत्मा कहती है - "यह मेरा सामान नहीं है; मेरा आनंद परमात्मा में है, क्योंकि मैं उसका अंश हूँ।"

तो जैसे शरीर का प्राण आत्मा है और शरीर उसका सर्वेन्ट है, वैसे ही आत्मा भी भगवान् का शरीर है - तस्येदं शरीरं - और भगवान् आत्मा की आत्मा हैं।
कृष्णमेनमवेहि त्वं आत्मानं सर्वदेहिनाम् -
समस्त आत्माओं की आत्मा परमात्मा श्रीकृष्ण हैं, इसलिए राधावल्लभ श्रीकृष्ण हमारे प्राण हैं - अर्थात् आत्मा के प्राण हैं। जैसे शरीर का प्राण आप हैं, वैसे ही आपका प्राण श्रीकृष्ण हैं। जैसे आपका शरीर आपका नौकर है, वैसे ही आप भी श्रीकृष्ण के सर्वेन्ट हैं - पर आप यह बात भूल गए।

हमने उल्टा कर दिया - जो इंद्रियाँ, मन और बुद्धि हमारे सर्वेन्ट थे, हम उनके सर्वेन्ट हो गए। मन जैसा कहता है, हम वैसा करते हैं। इसी कारण माया
ने हमें चौरासी लाख योनियों में घुमाया और असंख्य दुःख दिए। अभी सबसे बढ़िया शरीर - मनुष्य शरीर - मिला है, फिर भी हम दुःखी हैं - शरीर के रोग, मन की कामनाएँ, काम-क्रोध-लोभ-मोह, और संसार के संबंधों में अटैचमेंट के कारण निरंतर दुःख भोग रहे हैं। यह आश्चर्य की बात है कि  इतना दुःख भोगते हुए मनुष्य ज़िंदा हैं और मरना भी नहीं चाहता।

हमारी गलती यही है कि हम भूल गए कि हम श्रीकृष्ण के सर्वेन्ट हैं। ये शरीरेन्द्रिय-मन-बुद्धि आत्मा के सर्वेन्ट हैं लेकिन गलत साइड में जा रहे हैं - पानी को मथकर घी निकालना चाहते हैं। इंद्रियाँ और मन कहते हैं कि संसार में आनंद है, इसलिए मनुष्य संसार पाने के लिए भागता रहता है - एक लाख, फिर एक करोड़, फिर एक अरब, फिर इंद्र का पद, फिर ब्रह्मा का पद - यह इच्छा कभी समाप्त नहीं होती। अनंत जन्म बीतने पर भी यह समझ में नहीं आया कि संसार से आनंद नहीं मिल सकता।

मनुष्य शरीर पाकर हमें समझ लेना चाहिए कि एक ही वस्तु - चाहे वो माँ, बाप, पति, पत्नी कोई हो - कभी सुख देती है, कभी दुःख; कभी उनसे अटैचमेंट होता है तो कभी वैराग्य। प्रैक्टिकल तौर पर हमने अपने आपको भगवान् का दास नहीं माना - यानी इस बात को बार-बार चिंतन के द्वारा पक्का नहीं किया। जैसे हम अपने शरीर को ढँकने के लिए हर समय सावधानी रखते हैं, वैसे ही हर समय भगवान् को अपने साथ रियलाइज़ करना चाहिए - "वे मेरे हृदय में बैठे हैं। मैं उनके साथ हूँ; वे मेरे स्वामी हैं। उन्हीं से मुझे आनंद मिलेगा। संसार केवल शरीर चलाने के लिए है - इसको खाना-पानी, विटामिन-प्रोटीन देना है, ताकि भजन और साधन हो सके।

जीवन बीतता जा रहा है - लेकिन यह अभ्यास आपने नहीं किया। किसी के जीवन की कोई श्योरिटी नहीं कि वह 60-70 वर्ष तक जीवित रहे। मृत्यु कभी भी आ सकती है और एक क्षण भी नहीं रुकती। चाहे राजा, रंक, फकीर हो या स्वर्ग सम्राट इंद्र हो - टाइम आने पर जाना पड़ेगा। इसलिए मानव शरीर पाकर लापरवाही नहीं करनी चाहिए।

रोज़ सोते समय अपने दिन का विचार करना चाहिए - आज भगवान के निमित कितनी देर साधना की? कितनी देर भगवान् का स्मरण किया? - और निश्चय करना चाहिए कि कल से लापरवाही नहीं होगी। इस प्रकार रोज़-रोज़ अपने को रिव्यू करो और साधना अधिक बढ़ाओ।

तब जब आप कहेंगे या सुनेंगे "राधा वल्लभ मेरे प्राण", तो रोम-रोम में आनंद भर जाएगा।  अभी जब आप लोग गाते हैं "राधा वल्लभ मेरो प्राण" - आपको अंदर से कोई फ़ीलिंग नहीं होती कि राधा वल्लभ हमारे कौन हैं - वे तो हमारे सबसे बड़े रिश्तेदार हैं, उनसे बड़ा और कोई रिश्तेदार नहीं है। फिर उनके नाम में कितना प्यार होना चाहिए?

अभी तो संसारी बच्चे के नाम लेने से आपको जितनी खुशी होती है, उतना भी भगवान् के नाम गाने में नहीं होती - यह लापरवाही है। ऐसा नहीं करना चाहिए।

इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें:

Prandhan Jivan Kunjbihari - Hindi

Read more