Daily Devotion - Jan 18, 2026 (Hindi)- मायाधीन जीव में चार दोष
साधक का प्रश्न - जीव में कौन से चार दोष हैं और उनका भावार्थ क्या है?
श्री महाराज जी का उत्तर -
प्रत्येक मायाधीन, अज्ञानी मनुष्य में चार दोष होते हैं -
- भ्रम,
- प्रमाद,
- विप्रलिप्सा,
- करणापाटव
- भ्रम -
किसी वस्तु को सही रूप में न पहचानकर उसे गलत रूप में निर्णय लेना। जैसे - पीतल की चेन को सोना समझ लेना। मैं आत्मा हूँ, पर अज्ञान के कारण अपने को देह मानना। अनादिकाल से भगवान् के विमुख होने के कारण जीव को भ्रम हो गया है कि "मैं शरीर हूँ।"
भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्यात्। ईशात् अपेतस्य 'विपर्ययोऽस्मृतिः'॥ (भागवत)
मति-विपर्यय को भ्रम कहते हैं - अर्थात बुद्धि किसी वस्तु का सही रूप न समझकर उसका उल्टा समझे - यही भ्रम है। - प्रमाद -
मन की असावधानी या लापरवाही को प्रमाद कहते हैं। उदाहरण के लिए, समझदार होकर भी लापरवाही के कारण किसी को गलत शब्द बोल देना। - विप्रलिप्सा -
अपने दोष को छुपाना। हर चीज़ में दखल देने का अहंकार रखना। किसी विषय का ज्ञान हो या न हो - फिर भी उसके बारे में ज़बरदस्ती बोलना। यानी अपनी अज्ञानता को छुपाना, अपने दोष को न मानना। गुरु भी अगर हमारी गलती बता दें तो तुरंत बोलते हैं - "नहीं महाराज जी," फिर बात बनाते हैं। हमें अपनी बुद्धि का इतना अहंकार है। गुरु के द्वारा गलती बताने पर सबसे पहले बोलना चाहिए, "जी", फिर सोचना चाहिए कि "हाँ, मैंने ये गलती की है, सही बात है।" और अगर फिर भी समझ में न आए, तो नम्रतापूर्वक उनसे पूछना चाहिए। तब वे बताएँगे कि शास्त्र-वेद के अनुसार गलती कैसे हुई। फिर मान लेना चाहिए, बहस नहीं करनी चाहिए।
लेकिन हम लोग ऐसा नहीं करते - हम अपने दोष को छुपाते हैं। यह बीमारी 100% सभी में है। - करणापाटव - अनुभवहीन होने पर भी अपने को अनुभवी सिद्ध करना। मान लो कि किसी विषय में कोई सर्वज्ञ है, पर सैकड़ों विषय हैं, और उन सबमें वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता। कोई इंजीनियर है तो वो डॉक्टर नहीं है और अगर कोई डॉक्टर है तो वो लॉयर नहीं है। फिर भी अपने को सभी में अनुभवी सिद्ध करना - यह करणापाटव है।
ये चारों दोष सब मायाधीन में होते ही हैं और भगवत्प्राप्ति तक रहेंगे - केवल साधना के अनुसार किसी में कम, किसी में अधिक। यह बात हर समय समझे रहो।
इसलिए कभी भी अपने को एक जन्म की हिस्ट्री से न नापो - कि "इस जन्म में तो मैंने किसी आदमी की हत्या नहीं की, मैं बहुत बड़ा पापी तो नहीं हूँ।" अगर अनंत जन्मों के फाइल हमारे सामने रख दी जाए, तो पता चलेगा कि कोई छोटा-बड़ा नहीं है। अगर एक जन्म में किसी ने एक पाप किया है तो भी अनंत जन्मों में अनंत पाप किए बैठा है। लेकिन जो इस बात को रियलाइज़ करेगा, उसके पाप कम होते जाएँगे।
जाने ते छीजहिं कछु पापी -
जो अपने आपको जितनी लिमिट में पापी मान लेगा, वह उतनी लिमिट में भगवान् के सामने आँसू बहा सकेगा, और उसका अंतःकरण शुद्ध होता जाएगा।
इसलिए साधना करनी है।
महाप्रभु जी का पहला उपदेश है - तृणादपि सुनीचेन - अपने को तृण से अधिक दीन और पापात्मा मानो। यह फैक्ट है। हमारे अनंत जन्मों के पाप जो संचित कर्म के रूप में जमा हैं, वो भगवत्प्राप्ति के बाद माफ़ कर दिए जाते हैं। उसके बिना जीव का कभी उद्धार नहीं हो सकता।
भगवान् का विरद है कि -
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि।
वे सब पापों को क्षमा करके हमें विशुद्ध कर देते हैं।
संसारी गवर्नमेंट में ऐसी सुनवाई नहीं होती, लेकिन भगवान् के गवर्नमेंट में अनंत पाप क्षमा हो जाते हैं। भगवत्कृपा से ये चारों दोष एक साथ सदा के लिए चले जाते हैं।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें: