Daily Devotion -Mar 15, 2026 (Hindi)- गुरु मंत्र
कान में गुरु मंत्र फूँकना सब धोखा है। जो ऐसे करते हैं, उनसे पूछो आपके मंत्र में क्या खास बात है? अगर वो ये कहें कि इसमें पावर है, सिद्ध है। तो कान में मंत्र देते ही तुरंत दिव्यानंद की फीलिंग होनी चाहिए क्योंकि तत्क्षण भगवत्प्राप्ति हो जाती। जब मामूली से करंट को छूने से सारा शरीर कांप जाता है, तो क्या ऐसा संभव हो सकता है कि दिव्यानंद मिलने पर कोई फीलिंग ही नहीं हुई, बल्कि हालत और फटीचर होती जा रही है? तमाम मंत्र तो शास्त्रों भागवत वगैरह में लिखे हैं, कोई भी पढ़कर उनका जाप कर सकता है - उससे क्या होगा?
दीक्षा का मतलब ये है - उदाहरण के लिए - आप अपने घर में सब तारों का फिटिंग कर लीजिए, फिर बल्ब, पंखा आदि लगा दीजिए। इसके बाद आप पॉवर हाउस से कहिए कि हमको पावर दे दो। उसने पॉवर दिया और तुरंत लाइट जल गई, पंखे चलने लगे। तो अगर घर में फिटिंग नहीं होगी तो कहाँ लाइट देगा पॉवर हाउस?
वैसे ही, पहले भक्ति करनी होगी, जिससे अंतःकरण शुद्ध होगा। अब जो गड़बड़ हमारे अंदर थी, सब चली गई। फिर कोई एक हज़ार गाली भी देगा तो भी हम नॉर्मल रहेंगे। जब अन्तःकरण शुद्ध होगा तब हमारे मन में अच्छे-अच्छे विचार आएँगे, लेकिन तब भी माया रहेगी। फिर गुरु स्वरूप शक्ति के द्वारा अंतःकरण को दिव्य बनाएँगे, तब माया जाएगी और दिव्य प्रेम उसके अंदर आएगा हमेशा के लिए - इसी को दीक्षा कहते हैं।
साधक का प्रश्न - अभी वो स्थिति क्यों नहीं बन पा रही है कि छोटी-छोटी बातों पर हमको क्रोध न आए?
श्री महाराज जी का उत्तर - मधुसूदन सरस्वती ने वृन्दावन में गोवर्धन कि परिक्रमा की, लेकिन भगवान् नहीं मिले। वे बहुत दिनों तक परिक्रमा करते रहे, तब जाकर भगवान् के दर्शन हुए। तो मधुसूदन ने उनसे रूठकर पीठ कर लिया, कि तुम इतनी देर से क्यों आए। तब भगवान् ने उनके पापों का पहाड़ दिखाया और कहा कि "तुम्हारे इतने पाप थे। ये सब जलकर भस्म हो जाएँ, तब तो मैं आऊँ?"
तो हमारे पास अनंत जन्मों के पाप जमा हैं। अनंत जन्मों का जमा हुआ मैल को धोने में समय लगेगा। और साधना भी सही-सही नहीं कर रहे हो- बिना रूपध्यान किए, केवल मुँह से कीर्तन करके आरती करने से काम नहीं बनेगा। आँसू कितने बहाए? भगवान् हमारे अंतःकरण में नित्य रहते हैं और वे सर्वव्यापक भी हैं - यह सुना और पढ़ा है, लेकिन चौबीस घंटे में तुम एक घंटे के लिए भी इसे नहीं मानते। हम प्राइवेसी रखते हैं और ये सोचते हैं कि हम जो सोच रहे हैं, कोई नहीं जानता। अपने आपको धिक्कारो और अपनी कमी मानो। केवल लेक्चर सुन लिए, अहंकारयुक्त, बिना रूपध्यान किए और बिना आँसू बहाए कीर्तन कर लिया, आरती कर ली - ये कोई साधना है?
असली साधना तो ये है - मानव शरीर का महत्त्व और इसकी क्षणभंगुरता को समझते हुए -
- भगवान् के लिए आँसू बहाओ। और
- हर समय, हर जगह महसूस करो कि भगवान् हमारे साथ हैं। अनंत बार जब भी मानव देह मिली, हमने यही लापरवाही की। संसार में आसक्त रहे। सही साधना लगातार करते रहोगे तो एक दिन लक्ष्य ज़रूर प्राप्त होगा।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें: