Daily Devotion - Feb 3, 2026 (Hindi)- गुरु शरणागति
गुरु की प्रत्येक आज्ञा को तर्क-वितर्क-कुतर्क किए बिना, पूर्ण शरणागत होकर मानो।
शरणागति के विपरीत नामापराध ही हमको आगे बढ़ने नहीं देता। जिस दिन गुरु के हमारे दोष बताने पर हम 'भीतर से' विभोर हो जाएँ, यह सोचकर कि उनकी निगाह मेरे कल्याण पर है, उस दिन समझो शरणागति प्रारम्भ हुई।
गुरु के किसी डांट पर, दोष बताने पर कम से कम चुप रहना सीखो। "यस सर, जी हाँ", फिर सोचो। अगर नहीं सोच पाते, तो भी मान लो। वो तुम्हारे भविष्य तक की सोचकर के तुमको आदेश देते हैं। हमारी बुद्धि नहीं समझती। इसका परिणाम गलत होगा, ये गुरु समझते हैं। हम वर्तमान को न देखें। यहाँ तक आपको एक दिन जाना पड़ेगा, तब कल्याण होगा।
अगर हम गुरु शरणागति नहीं करेंगे तो - पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनं - हमें चौरासी लाख में घूमना पड़ेगा।
हरि गुरु के ठीक ठीक शरणागत होने पर ही हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें: