Daily Devotion - Feb 25, 2026 (Hindi)- भक्त और भगवान् में भेद
साधकों के दो प्रश्न:
- भक्त और भगवान् में क्या भेद है?
- आचार्यं मां विजानीयात् - प्रार्थना में जो श्लोक बोला जाता है, इसको डिटेल में समझाइए।
श्री महाराज जी का उत्तर -
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्। न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत सर्वदेवमयो गुरुः॥ (भागवत 11.17.27)
आचार्य का अर्थ गुरु है। गुरु वह होता है जो श्रोत्रिय भी हो और ब्रह्मनिष्ठ भी हो। अर्थात् वह शास्त्रों और वेदों का ज्ञाता भी हो और शास्त्रों-वेदों के निष्कर्ष को समझा भी सकता हो। और जिसने भगवत्प्राप्ति भी की हो - भगवद्-दर्शन आदि किए हों - जो श्रीकृष्ण-तत्त्व का वेत्ता हो:
जेइ कृष्ण-तत्त्व-वेत्ता सेइ गुरु हय (गौरांग महाप्रभु)
इस भागवत के श्लोक का अर्थ भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं करते हैं:
i) आचार्यं मां विजानीयात् -
गुरु को मेरा स्वरूप समझो। गुरु मुझसे पृथक नहीं हैं। हृदय से मानो कि गुरु मैं ही हूँ।
ii) नावमन्येत -
भूलकर भी गुरु के प्रति दुर्भावना न होने पाए। कभी भी उनका अपमान न होने पाए। गुरु का अपमान हो गया तो भगवान् क्षमा नहीं करते हैं।
विष्णुस्थाने कृतं पापं गुरुस्थाने प्रमुच्यते।
गुरुस्थाने कृतं पापं वज्रलेपो भविष्यति॥
गुरु के पास भगवान् के प्रति किए हुए अपराध को क्षमा करने का अधिकार होता है, लेकिन गुरु के प्रति अपराध हो जाए तो भगवान् क्षमा नहीं करते हैं। अपराध का अर्थ है दुर्भावना।
दुर्भावना क्या होती है? -
iii) न मर्त्यबुद्ध्यासूयेत -
मर्त्य-बुद्धि का अर्थ है गुरु के प्रति मनुष्य की बुद्धि लाना - इसे नामापराध कहते हैं। मनुष्य की बुद्धि लाने का अर्थ है यह सोचना कि गुरु भी हमारी तरह खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं, रोते हैं, हँसते हैं, गाते हैं, और सुख-दुख का अनुभव करते हैं। जैसे हम हैं, वैसे ही वे भी हैं, केवल हमसे थोड़े अच्छे होंगे - ऐसा सोचना मर्त्य-बुद्धि है। गुरु का शरीर तो मनुष्य का है, और उनका व्यवहार भी हमारे जैसा ही है, बल्कि हमसे भी करोड़ों गुना आगे - अर्जुन और हनुमान ने करोड़ों मर्डर कर डाले। लेकिन वे महापुरुष बने रहे, क्योंकि महापुरुष माया के कर्म करते हुए माया से परे रहते हैं, जैसे भगवान माया का कर्म करते हुए माया से परे रहते हैं। दोनों का काम योगमाया से होता है।
iv) सर्वदेवमयो गुरु:
सब दैवी शक्तियाँ गुरु में बैठी रहती हैं क्योंकि उनको भगवान् स्वयं गवर्न करते हैं।
इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः॥
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः।
पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परा गतिः॥" (कठोपनिषद्)
इन्द्रियों से परे उनके विषय हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे आत्मा है, आत्मा से परे माया है, और माया से परे भगवान् हैं।
तो बुद्धि से परे माया है। पहले माया जीव को गवर्न करती है, इसलिए जीव कर्म का फल भोगता है। लेकिन जब जीव भगवान् के शरणागत हो जाता है, उसकी माया हट जाती है। उसके बाद जीव को भगवान् गवर्न करते हैं। तो भगवत्प्राप्ति के बाद महापुरुष कुछ भी नहीं करता, कुछ भी नहीं कर सकते।
क्योंकि प्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते -
घोर मूर्ख भी बिना प्रयोजन के कोई कर्म नहीं करता।
भगवत्प्राप्ति यानी आनंद-प्राप्ति होने के बाद - तस्य कार्यं न विद्यते - उनके लिए कुछ भी प्राप्त करना शेष नहीं रहता। इसलिए उनको कर्म फल नहीं मिलता - न अच्छे कर्म का, न बुरे कर्म का। वैसे तो उनको कोई कर्म करना ही नहीं चाहिए, लेकिन भगवान् और महापुरुष कर्म करते हुए दिखाई पड़ते हैं।
हम भगवान् की या संत की एक भी बात को नहीं समझ सकते।
जार चित्ते कृष्ण-प्रेम करये उदय।
तार वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय॥
प्रेमियों के, भक्तों के, महापुरुषों के वाक्यों, क्रियाओं और हरकतों को बड़े-बड़े ज्ञानी परमहंस भी न जान सकते हैं, न ही समझ सकते, क्योंकि वे बुद्धि से परे होते हैं। इसलिए गुरु के प्रति मनुष्य की बुद्धि लाना नामापराध है, जो सबसे बड़ा पाप होता है। फिर उसको किसी से बोलना - इसे निंदा कहते हैं और वो उससे भी बड़ा पाप होता है।
महापुरुष और भगवान् का कार्य योगमाया से होता है, और हमारा कार्य माया से होता है - ये अंतर है। अपनी पर्सनालिटी में रहते हुए माया का काम करे - उसको योगमाया कहते हैं। भगवान् और महापुरुष इम्पॉसिबल को पॉसिबल करते हैं - उनके पास कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्था शक्ति है।
तो भगवान् कहते हैं कि गुरु में कभी भी मर्त्य-बुद्धि मत करना। अगर किए, तो नामापराध हुआ, भगवान् करोड़ों कोस दूर हो जाते हैं, चाहे आँसू बहा-बहा के मर जाओ, वे क्षमा नहीं करते।
अनादि काल से यही होता आया है। हमने भगवान् श्रीकृष्ण के लिए अनंत आँसू बहाए हैं, लेकिन साथ ही नामापराध भी किए हैं।
हेन कृष्ण-नाम यदि लय बहु बार।
तबु यदि प्रेम नाहि, नहे अश्रुधार।
तबे जानि 'अपराध' प्रचुर॥ (चैतन्य चरितामृत)
तुमने बार-बार, बार-बार नामापराध किया है। गुरु जी के आगे बैठेकर गुरु जी के प्रति विपरीत सोच रहे हैं - "गुरु जी ने इनको माला क्यों दे दिया, हमको क्यों नहीं दिया? गुरु जी ने इनकी ओर देखा, मेरी ओर क्यों नहीं देखा?" ऐसा सोचना नामापराध हैं। दस रुपया कमाया और सौ रुपया खर्च किया - तो साधना का फल क्या मिलेगा?
नाम्नामकारि बहुधा निजसर्वशक्तिस्तत्रार्पिता नियमितस्मरणे न कालः।
एतादृशी तव कृपा भगवन्ममापि दुर्दैवमीदृशमिहाजनि नानुरागः॥ (शिक्षाष्टकम्)
गौरांग महाप्रभु ने 'दुर्दैव' शब्द का अर्थ किया - नामापराध। नामापराध के कारण ही भगवन्नाम में भगवान् की शक्ति होते हुए भी हम उससे वंचित हो जाते हैं। नाम और नामी में अनुराग नहीं हो पाता। लगातार बोलते जा रहे हैं - राधे-राधे, श्याम-श्याम। थोड़ा-थोड़ा अनुराग जो है, वो गुरु-कृपा से हुआ है, अपनी कमाई से नहीं। लेकिन इतनी देर नहीं होनी चाहिए, अनंत जन्म बीत गए और हम राधा-कृष्ण से नहीं मिल सके। उसका नामापराध ही कारण है।
"एष वै भगवान् साक्षात्..." - प्रार्थना में ये श्लोक भी आप लोग बोलते हैं।
एष माने ये गुरु, ये महापुरुष। आचार्य साक्षात् भगवान् है। क्योंकि भगवान् ही उनको अंदर बैठकर गवर्न करते हैं।
जिसने भगवान् को पा लिया, भगवान् अपनी सारी शक्ति उसको दे देते हैं। इसलिए भेदाभावात् - भक्त और भगवान् में भेद नहीं होता। इसलिए जैसी भक्ति भगवान् के प्रति हो, वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति होना चाहिए। भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुरनाम वपु एक।
हम रामायण, गीता, भागवत कोई ग्रंथ क्यों मानते हैं? इसलिए नहीं मानते कि उन्हें तुलसीदास ने बनाया है वो महापुरुष थे, सूरदास ने बनाया है। इसलिए मानते हैं क्योंकि उनकी माया हट गई - अब भगवान् उनके इन्द्रिय, मन और बुद्धि के डायरेक्ट गवर्नर हो गए - सबका भगवान् से एक स्वरूप हो गया। तो संत कहते हैं -
जो करे सो हरि करे, होय कबीर कबीर।
उर प्रेरक रघुपति विभूषण।
यानी "मैं कुछ नहीं करता, वो जैसा कराते हैं वैसा हम करते गए।"
भगवान् को पाने के बाद महापुरुष अपनी बुद्धि से कुछ नहीं करता क्योंकि छुट्टी हो गयी - मुक्ति माने छुट्टी। अब वे जो कुछ भी करते हैं केवल जीव-कल्याण के लिए करते हैं, अपने लिए कुछ नहीं करते, और वो भगवान् के द्वारा गवर्न होता है।
"यस्य साक्षात् भगवति..." फिर वही भागवत ग्रंथ कह रहा है - साक्षात् भगवति।
ज्ञानदीपप्रदे गुरौ मर्त्यासद्धीः - यदि गुरु में मनुष्य-बुद्धि लाई, तो पतन हो जाता है। मिथ्या अहंकार - किसी को शरीर की सुंदरता का अहंकार, किसी को पैसे का अहंकार, किसी को बुद्धि का अहंकार, किसी को युवावस्था का अहंकार। अहंकार के कारण ही भगवान् और संत का अपमान होता है।
तो भक्त और भगवान् में भेद नहीं होता।
यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ।
तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥
जैसी भक्ति भगवान् के प्रति हो, वैसी ही भक्ति गुरु के प्रति हो। 0.1% भी न भगवान् की भक्ति कम हो और न गुरु की कम हो। दोनों एक हैं ऐसा मानकर दोनों की भक्ति करो।
भगवान् ने स्वयं कहा है कि भक्त यानी महापुरुष उनसे बड़े हैं। वो इसलिए बड़ा मानते हैं कि गुरु के द्वारा ही हमको लक्ष्य की प्राप्ति होती है।
भगवान् तो हमको समझाने आएँगे नहीं कि भगवान् क्या होता है, जीव क्या होता है, माया क्या होती है, संसार क्या होता है। हमको ज्ञान देने वाला सबसे पहले महापुरुष, फिर उसकी साधना बताने वाला भी महापुरुष, फिर साधना के समय हमको बार-बार संभालने वाला भी महापुरुष। फिर जब अंतःकरण शुद्ध हो गया सेंट परसेंट भक्ति के द्वारा, तो दिव्य प्रेम, दिव्य शक्ति देने वाला - वो भी गुरु। भगवान् नहीं देते। अब जब शक्ति मिल गयी, अब भगवान् आ गए साथ में। निर्मल मन होने पर भगवान् आते हैं। जिसने भगवान् को पा लिया, उसको भगवान् अपनी सारी शक्ति दे देते हैं और वो भगवान् के बराबर हो जाता है।
हमारे स्वार्थ के हिसाब से गुरु बड़े हैं भगवान् से, क्योंकि अगर गुरु न होते तो विश्व में किसी को भगवत्प्राप्ति ही न होती।
इसलिए भक्त और भगवान् में भेद-बुद्धि नहीं रखो। आचार्य माने गुरु को मेरा स्वरूप मानो, न मर्त्यबुद्ध्या, और गुरु और भगवान् दोनों की साथ-साथ भक्ति करो।
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