Daily Devotion - Feb 21, 2026 (Hindi)- मेरी राधारमण सों यारी

Daily Devotion - Feb 21, 2026 (Hindi)- मेरी राधारमण सों यारी

श्यामसुंदर की यारी और संसार की यारी में अंधकार और प्रकाश के समान अंतर है। संसार की यारी अंधकार है और राधारमण की यारी प्रकाशरूप है। संसार की यारी में केवल इंद्रियों का विषय मिलता है और वह भी स्वार्थ पर आधारित होता है। संसार में ज़रा सा भी प्यार केवल स्वार्थ के लिए 'ही' होता है। चाहे माँ, बाप, बेटा, स्त्री या पति कोई भी हो - जो जितना अधिक प्यार का करता है, उसके भीतर उतना ही बड़ा स्वार्थ छिपा होता है। लोग कहते हैं, "हम आपके लिए जान दे देंगे," लेकिन वास्तव में बिना स्वार्थ के कोई निगाह भी नहीं उठाता। जान देना तो केवल कल्पना की बात है।

लेकिन यह मक्कारी नहीं, बल्कि हमारा नेचर है। हम आनंद के भूखे हैं। बुद्धि ने यह भ्रम कर लिया कि संसार के रिश्तों-नातों में आनंद मिलेगा। मन तो बुद्धि का सर्वेंट है - बुद्धि जो डिसीज़न लेती है, मन को वही करना पड़ता है। चौबीस घंटों में हम अधिकांश कार्य - उठना, ऑफिस जाना, काम करना - बेमनी से करते हैं - क्योंकि उनको "करना पड़ेगा।" अर्थात् संसार में लोग दिन भर बनावट करते हैं। पैदा होने से लेकर हम दूसरों को देखकर एटिकेट सीखते हैं - लोग जैसे बैठते हैं, बात बनाते हैं, खाते हैं, व्यवहार करते हैं - हम भी वैसा ही करने लगते हैं।

यह बनावट सिद्ध करती है कि मन बुद्धि के अंडर में है। जिस समय बुद्धि जैसा कहेगी, मन को वैसा ही करना पड़ेगा। एक पाँच साल का बच्चा गरम जलेबी देखकर लार टपकाता है, लेकिन जब उसकी बुद्धि निर्णय देती है कि जेब में पैसा नहीं है, तो उसका मन दुकान की ओर देखना भी छोड़ देता है।

इसलिए यह कहना ठीक नहीं है कि "मेरा मन नहीं लगता।" मन कोई स्वतंत्र वस्तु नहीं है। वह तो दास है - न तो वह बुद्धि के खिलाफ बगावत कर सकता है, न ही रिज़ाइन कर सकता है। उसको तो सर्विस करना ही है। हम लोग जितना भी वर्क करते हैं, सब में बुद्धि प्रधान होती है। अगर बुद्धि का डिसीज़न गलत हो, तो कर्म भी गलत होता है।

हमारी बुद्धि तीन गुणों की शराब पिए हुए ड्राइवर की तरह है, इसलिए जीवन की गाड़ी ठीक से नहीं चलती। कभी सत्वगुण, कभी रजोगुण, कभी तमोगुण - हर क्षण बुद्धि बदलती रहती है। इसी कारण हमको कभी भगवान् दयालु लगते हैं, कभी यह लगता है कि भगवान् केवल इन्साफ करते हैं, तो कभी लगता है कि वे इन्साफ भी नहीं करते। अपने किए हुए कर्मफल के लिए भी हम भगवान् को दोषी ठहराते हैं। यानी बुद्धि में जो गुण हावी हो जाता है, उसी गुण का वर्क होगा, और मन भी वैसा ही चिंतन करेगा, क्योंकि मन बुद्धि का गुलाम है।

इसलिए शास्त्र-वेद कहते हैं, "तुम्हारी बुद्धि माया की बनी है, इसलिए वह कभी भी सही निर्णय नहीं दे सकती। इसलिए तुमको एक मायातीत महापुरुष की आवश्यकता है, जो तुम्हें यह समझा दें कि बुद्धि को कैसे गवर्न करना है। फिर तुम उस बुद्धि से मन को गवर्न कर सकते हो, और मन इंद्रियों को गवर्न कर सकता है।"

संसार का प्यार केवल स्वार्थ - यानी "लेना, लेना, लेना" पर आधारित है। स्वार्थ अधिक तो प्यार अधिक, स्वार्थ कम तो प्यार कम, स्वार्थ खत्म तो प्यार खत्म। यहाँ तक कि जिससे एक दिन प्यार का ऐसा दावा किया कि "तुम्हारे बिना मर जाएँगे", उसी से बाद में दुश्मनी भी हो जाती है।

श्यामसुंदर संबंधी प्यार में गुरु आदेश देते हैं -
"यदि हरि-गुरु से प्यार करना हो, तो "देना देना" सीखो। वे उसका हज़ार गुना करके तुमको लौटा देंगे। लेकिन तुम मत माँगो; तुम कामना मत बनाओ। तुम देना सीखो।"
प्रेम में देना-देना होता है, स्वार्थ में लेना-लेना और व्यापार में लेना-देना। सीधा गणित है।

जगत का प्यार स्वार्थ पर आधारित है, इसलिए वह एक स्तर पर टिक नहीं सकता - कभी कम, कभी ज़्यादा, और अंत में समाप्त।

लेकिन यदि श्यामसुंदर और गुरु से बिना स्वार्थ, केवल उनकी सेवा और उनके सुख के लिए प्रेम किया जाए, तो प्रेम घटने का प्रश्न ही नहीं उठता। इच्छा करना ही भूल है, क्योंकि वेद, शास्त्र और गुरु का आदेश है कि "अपने लिए कुछ न चाहो, केवल उनके सुख के लिए चाहो।" हम जो तन-मन-धन उनको अर्पित करते हैं, वह भी वास्तव में भगवान् का ही दिया हुआ है। और हमारी ये मायिक चीज़ें भगवान् के किस काम की? बल्कि भगवान् की इतनी बड़ी कृपा है कि वे इन गन्दी चीज़ों को लेकर उनको साफ करके, दिव्य बनाकर हमें लौटा देते हैं। भागवत कहती है -

स चानन्त्याय कल्पते -

वे उसे अनंत गुना करके तुमको वापस कर देते हैं। तो जहाँ कामना और स्वार्थ नहीं होता, वहाँ जीव निर्भय होकर आगे चलता जाता है। उसको सोचने का मौका ही नहीं मिलता कि "उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?"

संसार में इसका उल्टा है - "हमने चार पत्र भेजे और उन्होंने तीन ही भेजे। इसका मतलब उनका प्यार एक बटे चार कम है।" लोग ऐसा गणित लगाते हैं। स्वार्थ का प्रेम कभी भी एक दिन भी स्थाई नहीं रह सकता।

महापुरुष चैलेंज करते हैं -
आश्लिष्य वा पादरतां पिनष्टु माम्।
हे श्यामसुंदर! चाहे आलिंगन करके मुझसे प्यार कर लो, चाहे चक्र चलाकर मार दो या चाहे उदासीन होकर पूछो, " तुम कौन हो, कहाँ रहते हो?" इन तीनों अवस्थाओं में हम एक स्थिति में रहेंगे। बलिहार जाएँगे। तुम्हारे क्रोध पर भी बलिहार जाएँगे, तुम्हारे काम पर भी, तुम्हारे लोभ में भी, तुम्हारी ईर्ष्या में भी, किसी भी दोष में हम विभोर हो जाएँगे क्योंकि हम जानते हैं तुम निर्दोष हो, लीला कर रहे हो।

अगर भगवान् से हमारा प्यार निष्काम है, तो फिर वो प्यार बढ़ता ही जाएगा। इसीलिए प्रेम की परिभाषा की गई है - प्रतिक्षण वर्धमानम्। जिसका प्रेम प्रतिक्षण न बढ़े, वह समझ ले कि उसके प्रेम में कहीं न कहीं स्वार्थ छिपा है, जो उसे आगे बढ़ने से रोक रहा है।

इसलिए श्यामसुंदर वाला यारी का प्रेम संसार से न्यारा है - इस आशय से श्री महाराज जी कह रहे हैं -
"मेरी यारी जगत सों न्यारी।"

इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें:

Prandhan Jivan Kunjbihari - Hindi

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