Daily Devotion - Feb 19, 2026 (Hindi)- अधाधुंध दरबार
तीन प्रकार के दरबार होते हैं -
- न्याय का दरबार -
यह ठाकुर जी का दरबार है, जिसमें केवल न्याय होता है। भगवान् कहते हैं -
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः -
मैं समदर्शी हूँ। न मेरा कोई अपना है, न कोई पराया। चूँकि मुझे किसी से कुछ चाहिए नहीं, इसलिए मेरा कोई दोस्त नहीं है। और मेरा कोई बाल बाँका नहीं कर सकता, इसलिए मेरा कोई दुश्मन भी नहीं। ये न्यायकर्ता भगवान् हैं। - अन्याय का दरबार -
जिसमें अन्याय होता है। यह संसार में होता है, जहाँ खुद की गलती होने पर भी लोग दूसरे व्यक्ति को दोषी ठहराते हैं। जहाँ अटैचमेंट होता है, वहाँ मनुष्य अन्याय करता है, न्याय नहीं करता। - अधाधुंध दरबार -
यह राधारानी का दरबार है, जिसमें कृपा बँटती है। अधिकारी न होने पर भी कृपा होती है। जैसे जो गति यशोदा को मिली, वही गति पूतना को भी मिली - दोनों को गोलोक मिला। यानी यहाँ कृपा करने के लिए कोई न कोई बहाना ढूँढा जाता है। जैसे हाथी के पैरों के नीचे चींटी ठंडक महसूस करती है।
किशोरी जी का दरबार केवल कृपा का दरबार है। वहाँ न्याय वैसा नहीं होता, जैसा ठाकुर जी के दरबार में होता है। ठाकुर जी को तो निर्मल मन चाहिए -
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
और मन की गंदगी गुरु साफ करते हैं। उनमें इतनी सहनशीलता होती है कि वे जीव की दुर्भावना को सहकर भी उसके पीछे लगे रहते हैं। चूँकि गुरु हमारी ही क्लास में रह चुके होते हैं, वे जानते हैं कि अच्छा बनने में कितनी मेहनत लगती है। इसलिए गुरु माँ का स्थान लेकर सारा परिश्रम करते हैं, जीव को शुद्ध करते हैं और उसे भगवान् की गोद में बिठा देते हैं। उसके बाद ठाकुर जी उसे हृदय से लगा लेते हैं।
इसीलिए गुरु का स्थान भगवान् से बड़ा माना गया है क्योंकि उनसे ही हमारा मतलब हल होता है। ठाकुर जी बने-बने के साथी हैं। और दैत्यों को मारना, सृष्टि करना, उसकी रक्षा करना आदि कार्य ठाकुर जी करते हैं। लेकिन ये सब काम राधारानी नहीं करतीं। किशोरी जी तो केवल कृपा करती हैं और पतितों को हृदय से लगाती हैं।
जब संसारी माँ ही दया की मूर्ति होती है, तो राधारानी तो हमारी सच्चिदानंदमयी माँ हैं। उनके यहाँ अधाधुंध दरबार है। अगर हमने थोड़ी-सी भी साधना की, तो उनकी कृपा की वृष्टि होने लगती है।
उनके अधाधुंध दरबार को एक ऐतिहासिक घटना स्पष्ट करती है -
जयन्त ने कौए का रूप लेकर श्री राम के सामने ही सीता जी के वक्षःस्थल पर चोंच मारी। श्री राम को गुस्सा आया - यानी उसको दंड देने के लिए उन्होंने गुस्से की एक्टिंग की - और उसके पीछे एक तीर छोड़ दिया। जयन्त त्रैलोक्य में भागा-भगा घूमा। वह ब्रह्मा, विष्णु और शंकर - सभी के पास गया, लेकिन किसी ने उसे शरण नहीं दी। सबने उससे कह दिया कि यह सेंट्रल गवर्नमेंट का मामला है। सुप्रीम पावर ने तुम्हारे पीछे बाण लगाया है। हम तो प्रोविंशियल हैं, हम कुछ नहीं कर सकते। तब नारद जी ने उससे कहा कि तुम सीता जी के चरणों में गिरो।
जब वह सीता जी के चरणों में गिरा, तो मैया ने श्री राम से कहा - "इसको क्षमा कर दीजिए।" पर लेकिन श्री राम ने यह कहकर मना कर दिया कि यदि क्षमा कर दिया गया, तो यह फिर अपराध करेगा।
तब सीता मैया ने श्री राम से पूछा - न कश्चिन्नापराध्यति?
क्या ऐसा कोई व्यक्ति संसार में हुआ है, है, या होगा, जिस पर आपकी कृपा न हो और वह अपराध भी न करे? जब तक आपकी कृपा नहीं होगी और माया चली नहीं जाएगी, तब तक तो सब अपराध ही करते हैं। यह माया ही अपराध कराती है। यह सुनकर श्री राम चुप हो गए और उन्होंने जयन्त को माफ कर दिया।
वही सीता जी किशोरी जी राधा बनकर आईं। उनका अंधादुंध दरबार है।
इस विषय से संबंधित जगद्गुरूत्तम श्री कृपालु जी महाराज की अनुशंसित पुस्तकें: